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स्वास्थ्य पर पड़ रहे बाहरी प्रभावों से बचने के लिए करें मन को पक्का

 

 

कुछ साल पहले, “बस 2 मिनट” के 3 शब्दों  ने सारी  गृहणियों के लिए संकट-मोचन का काम कर दिया था | भोजन में क्रांति आ गई | बच्चे तो उसी का गुणगान करने लगे | नाश्ते में,  टिफिन में, बे-टाइम भूख लगी हो या फिर अचानक मेहमान आ जाएँ तो – सिर्फ़ डालो,  उबालो और बन गई | इस Ad  ने और इस आहार ने क्या क्या प्रभाव नहीं डाला | स्वास्थ्य की दृष्टि से यह शून्य थी | फिर भी समय बचाने व स्वाद की दृष्टि से यह सबके मन को भा गई |  कुछ  ने इसे समोसे में भी  घुसाने की हिम्मत की | और कुछ ब्रेड में भर कर खाने लगे |

 

ज्ञान इन्द्रियां, जो विभिन्न प्रकार का ज्ञान हासिल करने में इस्तेमाल होती हैं यानि – आखें, जीभ, कान, त्वचा और नाक | मन को इन इन्द्रियों का राजा होना चाहिए |  मगर इस उदहारण से पता चलता है कि मन अब उनका दास बन कर रह गया है | आखें किसी केक की सुन्दर icing को देखती हैं तो मन खाने को ललचा आता है | जीभ स्वाद लेने को तरसती है | मुँह में पानी भर जाता है | कोई अपरिचित भी अगर टेस्टी गोल गप्पों की बात करे तो कान वहां जाने की प्रेरणा देने लगते हैं | किसी पिज़्ज़ेरिया के बहार फैल रही चीज़ और लहसुन की सुगंध आपको भीतर जाने के लिए मजबूर करने लगती है |

 

कर्मेन्द्रियाँ भी तामसिक भोजन को ही चाहती हैं | तामसिक यानी – जिसे देर तक भुना हो, तला गया हो,  जिसमें तेज़ मिर्च मसाला हो या बासी हो |

 

मन चाहे कितना भी कहे – अरे रात को बेहजमि तंग करेगी, लेकिन हम मन की नहीं सुनते हैं | हाजमोला, हरड़ या पुदीन हरा है ना | और आज कल खाने के संदर्भ में मन पर इतने बाहरी प्रभाव भी काम कर रहे हैं कि मन उन में उलझ कर रह जाता है| उदाहरण के लिए टीवी पर आहार संबंधी आकर्षक ads  को देख कर मन उन्हें लेने और खाने को इतना ललचाने लगता है कि उस आहार के शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को नकार दिया जाता है | इन एड्स की मायाजाल से कोई नहीं बचा है | बच्चे – पिज़्ज़ा, नूडल्स, कोल्ड ड्रिंक्स और आइसक्रीम की एड्स देखते हैं, युवा शरीर को पुष्ट करने या आकर्षक दिखने के लिए तरह तरह के खाने की एड्स देखते हैं और बूढ़े जवान बनने वाली एड्स देखकर माया जाल में फंस जाते हैं |

 

किन्तु शरीर कब तक मन का साथ देगा | एक सीमा लांघ जाने पर प्रकृति सब संभाल लेती है और सही रास्ते पर चलने को मजबूर करती है | इन्द्रियों से प्रेरित हो कर और विवेक बुद्धि को परे रख कर जो भोजन खाया जाएगा, शरीर उसे कब्ज़ या दस्त का रूप दे देगा | शरीर की विसर्जन शक्तियां ढीली पड़ जाएंगी तो कई तरह की बीमारियों को जन्म देंगी | इसलिए शरीर की ज़रूरतों के अनुसार ही भोजन करें |

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A grandmother with innate love for reading and exploring, I have tried collecting and imbibing the goods from various Indian cultures through my journeys. A big advocate of natural way of living, I often refer back to my collection of books from Ayurveda and Naturopathy for home remedies that I have tried and tested over many years. I consider serving food a noble responsibility that goes a long way in creating happy minds and souls.

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